मुझ कोरे कागज़ के हिस्से में तेरी मोहब्बत की रोशनाई कुछ यूं आयी
कि खामोश-सी मेरी ज़िंदगी एक खूबसूरत नज़्म कहलाई…

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मेरी हर धड़कन नाम तेरा लेती है
पाकर तेरा एहसास मेरी रूह भी मुस्कुरा देती है
तेरे साथ से हर बिगड़ी बात सुधर जाती है
और उलझी-सी ये ज़िन्दगी खुद-ब-खुद सुलझ जाती है
गमों से अब ज़िन्दगी कर चुकी किनारा है
तेरे आने से खुशियों से महकती ज़िन्दगी रोज़ाना है
निराशाओं को मेरी साथ तेरी आशाएँ देती हैं
आँखें भी ये नम अब बस खुशी से होती हैं
लबों पर मुस्कान सुबह-शाम पहरा देती है
अब और कैसे कहें मुझपर रंग तेरी मोहब्बत का चढ़ा है
रंग तेरी मोहब्बत का चढ़ा है…..

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एक वक़्त था जब मोहब्बत इबादत सी लगती थी
और अब ऐसा है की मोहब्बत से हिकारत सी है
डर न तुझसे है न तेरी मोहब्बत से है
डर तो बस उस लम्हे से है जब तू भी
जब तू भी सरेआम
मोहब्बत को बेइज़्ज़त करेगा
अपने ही कसमों-वादों को भूल
इस इश्क़ की तौहीन करेगा
और फिर से बिखरेगा ये टूटा दिल
फिर से बिखरेगा ये टूटा दिल
और इस बार अंजाम यूँ होगा
कि हम टूटे ही रह जाएंगे
और मोहब्बत की जगह
दुनिया से हिकारत करने लग जाएंगे
दुनिया से हिकारत करने लग जाएंगे….

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बंजर ज़मीन-सी थी ये ज़िन्दगी मेरी,
तेरे नाम की बारिश क्या गिरी,
ये बंजर ज़मीन भी फल देने लगी,
अंजान था बारिश के रवैये से ये अंकुर इश्क़ का,
तभी तो मुस्कुरा कर दरारों से खिलने लगा,
वो मुस्कुराहट भी कहा बर्दाश्त हुई बारिश से,
झट थाम लिया खुद को बरसने से,
और बेचारा वो अंकुर इश्क़ का मेरे,
तरसता रहा बारिश से एहसास को तेरे,
जिस दरार से खिला उसी में मुरझा गया,
और बंजर-सी मेरी ज़िंदगी फिर बंजर हो गयी,

फिर बंजर हो गयी……

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हमसफ़र

निकले थे ज़िन्दगी के सफर में एक दोस्त की तलाश में
राहों में आपसे टकरा गए और हमें हमसफ़र मिल गया…..

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मुसाफ़िर-सी भटक रही हूँ,
तेरी यादों के गलियारों में,
कभी हँसती हूँ कभी रोती हूँ,
गुम हो तेरी बातों में,
तेरे प्यार की शीतल छाया मिले न मिले,
तेरी बेरुखी के कांटे अक्सर ही चुभ जाया करते हैं,
मैं राह देखती रहती हूँ,
तू राहे बदलता करता है,
मन्ज़िल से अनजान हूँ,
क्योंकि करती केवल मैं ही प्यार हूँ
जाने कब वो दिन आएगा,
ये दिल तेरा प्यार पाएगा,
और मुसाफ़िर-सी मैं,
भटकना छोड़ तेरे दिल में पनाह पा जाऊंगी,
तेरे दिल में पनाह पा जाऊंगी….

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रातें चिरागों की मोहताज़ नहीं होती,
ये चिराग के दम पर जीने वाले क्या जाने रात की खूबसूरती।
रात की खूबसूरती तो वो आशिक़ ही जाने,
जिसे रात की हर तस्वीर में न जाने मेहबूब को देखने के कितने मिले बहाने।

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