एक वक़्त था जब मोहब्बत इबादत सी लगती थी
और अब ऐसा है की मोहब्बत से हिकारत सी है
डर न तुझसे है न तेरी मोहब्बत से है
डर तो बस उस लम्हे से है जब तू भी
जब तू भी सरेआम
मोहब्बत को बेइज़्ज़त करेगा
अपने ही कसमों-वादों को भूल
इस इश्क़ की तौहीन करेगा
और फिर से बिखरेगा ये टूटा दिल
फिर से बिखरेगा ये टूटा दिल
और इस बार अंजाम यूँ होगा
कि हम टूटे ही रह जाएंगे
और मोहब्बत की जगह
दुनिया से हिकारत करने लग जाएंगे
दुनिया से हिकारत करने लग जाएंगे….

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बंजर ज़मीन-सी थी ये ज़िन्दगी मेरी,
तेरे नाम की बारिश क्या गिरी,
ये बंजर ज़मीन भी फल देने लगी,
अंजान था बारिश के रवैये से ये अंकुर इश्क़ का,
तभी तो मुस्कुरा कर दरारों से खिलने लगा,
वो मुस्कुराहट भी कहा बर्दाश्त हुई बारिश से,
झट थाम लिया खुद को बरसने से,
और बेचारा वो अंकुर इश्क़ का मेरे,
तरसता रहा बारिश से एहसास को तेरे,
जिस दरार से खिला उसी में मुरझा गया,
और बंजर-सी मेरी ज़िंदगी फिर बंजर हो गयी,

फिर बंजर हो गयी……

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हमसफ़र

निकले थे ज़िन्दगी के सफर में एक दोस्त की तलाश में
राहों में आपसे टकरा गए और हमें हमसफ़र मिल गया…..

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मुसाफ़िर-सी भटक रही हूँ,
तेरी यादों के गलियारों में,
कभी हँसती हूँ कभी रोती हूँ,
गुम हो तेरी बातों में,
तेरे प्यार की शीतल छाया मिले न मिले,
तेरी बेरुखी के कांटे अक्सर ही चुभ जाया करते हैं,
मैं राह देखती रहती हूँ,
तू राहे बदलता करता है,
मन्ज़िल से अनजान हूँ,
क्योंकि करती केवल मैं ही प्यार हूँ
जाने कब वो दिन आएगा,
ये दिल तेरा प्यार पाएगा,
और मुसाफ़िर-सी मैं,
भटकना छोड़ तेरे दिल में पनाह पा जाऊंगी,
तेरे दिल में पनाह पा जाऊंगी….

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रातें चिरागों की मोहताज़ नहीं होती,
ये चिराग के दम पर जीने वाले क्या जाने रात की खूबसूरती।
रात की खूबसूरती तो वो आशिक़ ही जाने,
जिसे रात की हर तस्वीर में न जाने मेहबूब को देखने के कितने मिले बहाने।

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उम्र थी उसकी कुछ अठरह बरस की,
आँखों में थी उमंग नई उड़ान की,
थी थोड़ी नादानी और थोड़ी समझ उसमें,
नई राहों को खोजने की थी चाह उसमें,
ज़िंदगी की राह में कई गैरों को भी अपना बना लिया,
बस इसी में ज़िंदगी का सबसे बड़ा धोखा खा लिया,
दो हाथ यूँ बढ़े उन अपनो में से कि,
रूह तक कपां गए उसकी,
चीखती-बिलखती अपनी इज़्जत की गुहार लगती रही वो,
पर बढ़ते ही रहे उसकी तरफ़ दो हाथ वो,
सिर्फ़ जिस्म से ही नहीं नोचा उसको,
अंदर तक झकझोर दिया उसको,
दर्द के एक-एक घूँट को तड़पते हुए पीती रही वो,
और उस घिनौने स्पर्श को नाकाम कोशिशों के बाद बेहोश पड़ी सहती रही वो,
वो दो हाथ जब हटे दूर,
उसकी जिंदगी मानो हो चुकी थी चूर-चूर,
पर ये गलतफहमी थी उन हाथों की,
उसका जिस्म तो जो नोच सके,
उसकी हिम्मत को मगर न तोड़ सके,
फिर से हुई वो खड़ी,
बुनने ख्वाबों की एक नई लड़ी,
खत्म हो चुकी ज़िन्दगी को एक नई शुरुआत दी,
और फिर से अपने लबों को मुस्कान दी,
बेशक़ उन लबों के पीछे आज भी उस मंज़र का गम है,
लेकिन हिम्मत में उसकी आज पहले से भी कई गुना दम है,
पहले से कई गुना दम है……

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ख्वाहिश थी आखरी दफ़ा तुम्हें गले लगाने की,
और एक बार टूट कर रोने की,
बस एक बार पूरी तरह बिखरना था बाहों में तेरी,
ताकी समेटे इस बिखरे दिल को तू और कुछ देर का सुख मिल सके बाहों में तेरी,
पर मेरे मुकद्दर में शायद लिखा ही न था ये होना,
मेरी तो ज़िन्दगी में लिखा था बस तेरे लिए रोना,
गले लगाने का मौका तो मिला नहीं,
पर तेरी आवाज़ सुनकर मिला सुकून भी कम नहीं,
रोये भी बहुत, टूटे भी बहुत और बिखरे भी हम,
बस फ़र्क था तो ये की समेटने को बाहें न थी तेरी,
बाहें न थी तेरी….
©so_called_kiddo